Posts

Showing posts from October, 2024

वह ही तो इंसान है

                 प्रदीप छंद (16-13)                वह ही तो इंसान है देख पड़ोसी की खुशहाली, जलना क्यों संसार में? कष्ट स्वयं को होगा आखिर, जलने से बेकार में। नहीं मिलेगी खुशहाली की, युक्ति तुम्हे बाजार में। करो मित्रता पता चलेगा, राज़ सभी उपहार में।। काम पड़ोसी ही आयेंगे, तेरे संकट काल में। साथ निभाना होगा तुमको भी उनका हरहाल में। सीखो उनसे और सिखाओ, जीना नहीं मलाल में। जीवन मत बरबाद करो फँस, द्वेष-कपट के जाल में।। पैर खींच ले गैरों का वह, मंजिल पाता है कहाँ? औरों से जलने वाला नर, सुख से खाता है कहाँ? आँसू देने वाला मानव, खुद मुस्काता है कहाँ? क्रोध भरा हो जिनके दिल में, गले लगाता है कहाँ? जलन,द्वेष से मानव अपने हाथों खोता मान है। अपना गैर समझने से निज मिट जाती पहचान है। अहंकार में रावण के सम, जिनकी सख्त जबान है। ऐसे लोगों का दुनिया में, होता कब गुणगान है? भला सोचता है जो सबका, जग में पाता मान है। प्रकट रूप में ऐसा मानव, धरती का भगवान है। बन जाये गैरों के पथ का बाधक वह शैतान है। काम समय पर आये सबका, वह ही ...

मंत्र सिद्ध अब होने दो

              (ताटंक छंद 16-14)             मन्त्र सिद्ध अब होने दो कभी मुफ्त की रोटी खाकर, देश सँवर क्या पाया है? मेहनतों को कामचोर का, मुकुट सदा पहनाया है। ताकत नहीं प्रजा को मिलती, कभी मुफ्त की रोटी से। शून्य हुए हैं अंग हमारे , राजनीति की गोटी से।। मुफ्त रोटियों की लालच ने, भेद कराया भाई में। चाह गगन को छूने की थी, गिरे मगर हम खाई में। जान गए हैं सच्चाई को, कर्मठ ही नभ छूता है। देश कर्मठों के ही बल पर, पाता सदा गुरूता है।। प्रजा जहाँ की मेहनती हो, खुशियाँ वहाँ समातीं हैं। जीवन की सारी सुविधाएं, प्रजा वहाँ की पातीं हैं। मान्य नहीं है हमको जीना, कंगाली की छाया में। भुगत रहा है श्रीलंका फँस, मुफ्त जाल की माया में।। देश सुरक्षित होने पर ही, प्रजा सुरक्षित होती है। मुफ्त रोटियाँ खाने वाली, प्रजा सदा ही रोती है। नींद खुली है आज हमारी, बीज कर्म का बोने दो। देश हमारा सबसे प्यारा, मन्त्र सिद्ध अब होने दो।।        राम कुमार चन्द्रवंशी         बेलरगोंदी (छुरिया)         ...

राम-राज्य आएगा कैसे

            राम-राज्य आएगा कैसे भूल राष्ट्रहित, लिप्त हुए हों, मानव निज कल्यान में, खींचातानी मची हुई हो, जनता और प्रधान में, गैर हितैषी, भ्रात शत्रु का भाव भरे हों प्राण में, राम-राज्य आएगा तो फिर, कैसे हिंदुस्तान में।। मानव जब मानव की ही, देख प्रगति जलने लगे, छोटी-छोटी बातों पर वे आपस में लड़ने लगे; दया-धर्म विस्मृत हो जाये, केवल धन हो ध्यान में, राम-राज्य आएगा तो फिर, कैसे हिंदुस्तान में।। ह्रास आचरण में आ जाये , बढ़ने लगे विलासिता, शरणागत हों वृद्धाश्रम में, जाकर के माता-पिता, माँस-सुरा का मोल बढ़े जब, पहुना के सम्मान में, राम-राज्य आएगा तो फिर, कैसे हिंदुस्तान में।। चोर-लुटेरे आदर पायें, धर्मनिष्ठ दर-दर फिरे, पापी का सीना हो चौड़ा, सत आरोपों से घिरे; लिप्त रहेंगे मानवगण जब, ढोंगी के गुणगान में, राम-राज्य आएगा तो फिर, कैसे हिंदुस्तान में।। त्याग भरत-सा करने वाला, नजर नहीं आता कहीं, लक्ष्मण जैसा भाई का बल, बना हुआ दिखता नहीं, दानी नहीं रहा जो दे दे, हरिश्चंद्र-सा दान में, राम-राज्य आएगा तो फिर, कैसे हिंदुस्तान में।। जिस दिन जीवों की पीड़ा को मानव अपना मानेगा,...