वह ही तो इंसान है
प्रदीप छंद (16-13)
वह ही तो इंसान है
देख पड़ोसी की खुशहाली, जलना क्यों संसार में?
कष्ट स्वयं को होगा आखिर, जलने से बेकार में।
नहीं मिलेगी खुशहाली की, युक्ति तुम्हे बाजार में।
करो मित्रता पता चलेगा, राज़ सभी उपहार में।।
काम पड़ोसी ही आयेंगे, तेरे संकट काल में।
साथ निभाना होगा तुमको भी उनका हरहाल में।
सीखो उनसे और सिखाओ, जीना नहीं मलाल में।
जीवन मत बरबाद करो फँस, द्वेष-कपट के जाल में।।
पैर खींच ले गैरों का वह, मंजिल पाता है कहाँ?
औरों से जलने वाला नर, सुख से खाता है कहाँ?
आँसू देने वाला मानव, खुद मुस्काता है कहाँ?
क्रोध भरा हो जिनके दिल में, गले लगाता है कहाँ?
जलन,द्वेष से मानव अपने हाथों खोता मान है।
अपना गैर समझने से निज मिट जाती पहचान है।
अहंकार में रावण के सम, जिनकी सख्त जबान है।
ऐसे लोगों का दुनिया में, होता कब गुणगान है?
भला सोचता है जो सबका, जग में पाता मान है।
प्रकट रूप में ऐसा मानव, धरती का भगवान है।
बन जाये गैरों के पथ का बाधक वह शैतान है।
काम समय पर आये सबका, वह ही तो इंसान है।
राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी (छुरिया)
जिला-राजनांदगाँव(छ. ग.)
9179798316
Comments
Post a Comment