चलो,जुरमिल आघू बढ़बो
"चलो,जुरमिल आघू बढ़बो"
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चलो,जुरमिल आघू बढ़बो।
अपन रद्दा म ठाढ़े परबत के
छाती ल चीर डरबो,
चलो,जुरमिल आघू बढ़बो।।
घाम चाहे बरसात होवय,
हम अपन करम ल करबो,
सुख-दुःख के हम फिकर करे बिन
अपन रद्दा म चलबो;
जिनगी ल सुगम बनाना हे,
तब भोंभरा ल काबर डरबो।
चलो,जुरमिल आघू बढ़बो।।
गियान बिना हे कला अधूरा,
कला बिना जिनगानी;
जिनगानी पानी बिन सुन्ना,
होवय नहीं किसानी;
त पानी अकारथ करबो काबर?
जुगत बचाये के करबो।
चलो,जुरमिल आघू बढ़बो।।
भेद भुलाके ऊँच-नीच के,
लेस के काँटा लालच रिस के;
गिरे-थके ल गला लगाके,
सींचबो भुइयाँ ल पसीना बोहाके;
अपन सुवारथ ल भुला के सब झन
देस बर जीबो-मरबो।
चलो,जुरमिल आघू बढ़बो।।
गियान के घर-घर जोत जलाबो,
अंतस के अंधियार मिटाबो;
दुःख-पीरा मिलजुल बिसराबो,
मया-पिरीत के बाग़ लगाबो;
होवत बिहनिया भारती माँ के
नित गुनगान ल करबो।
चलो,जुरमिल आघू बढ़बो।।
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राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी(छुरिया)
जिला-राजनांदगाँव
9179798316
दिनाँक-19/11/2017 को दैनिक दावा में प्रकाशित।
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