मेला
"मेला"
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एक दिन मेरा पुत्र बोला- चलो पिताजी मेला,
सारे पडोसी जा रहे हैं, घूमें ठेलम-ठेला।
मैं बोला-ठीक है बेटा, चलिए मुन्ना राजा।
मेला पहुँचते ही पुत्र बोला- उन्हें चाहिए बाजा।
मैं बोला-तुम क्या करोगे ? बाज़ा को ले संग,
बजा-बजाकर हम सबको करता रहेगा तंग।
पुत्र बोला-नहीं पिताजी, बिल्कुल नहीं तँगाऊंगा,
आप सभी जब सो जायेंगे, तब मैं बाज़ा बजाऊंगा।
मुश्किल से मनाया पुत्र को, खिलौना उन्हें थमाया,
तभी अचानक सात मित्रों के संग साला मेरा आया;
बड़े प्रेम से साले साहब होटल में मुझे बैठाया,
जो भी जैसा खाना चाहा, वैसा ही ऑर्डर फरमाया,
खूब मजे से खाये हम सब, मिठाई पैकिंग करवाया,
नौ सौ रूपये का बिल बना, मैं ही उसे पटाया;
खर्च हुए मेरे सारे रूपये, एक बचा न पाया,
लाना था तरकारी, किन्तु,वह भी घर न लाया।
पत्नी देखी खूब झुंझलाई, सबका मैंने झेला,
अब तक भुला न पाया हूँ मैं, गत बरस का 'मेला'।।
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राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी(छुरिया)
जिला-राजनांदगाँव
(दैनिक दावा rjn में 04/11/2017 को प्रकाशित।)
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