इंसानों को देखा है
इंसानों को देखा है√
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ऐ गिरगिट ! तू नाज न कर,
अपने रंग बदलने पर,
तेरा स्वयं पर नाज़ करना
सिर्फ,आँखों का धोखा है,
तुझसे ज्यादा इंसानों को-
हमने रंग बदलते देखा है।
ऐ नाग ! न कर तू नाज,
है फर्क कल में और आज;
अपने जहरीला होने का
क्यों तू भ्रम पालता है?
तुझसे ज्यादा इंसानों को-
हमने जहर उगलते देखा है।
ऐ चिंगारी ! न कर तू नाज,
त्याग,अपने अहं को त्याग,
तेरी लगायी आग को हमने
कुछ पल जलते देखा है,
तुझसे ज्यादा इंसानों को-
हमने आग उगलते देखा है।
ऐ बाज ! क्या सोचता है?
तू सबसे अच्छा नोचता है?
अगर यही विचार है तेरे
तो समझो यह तेरा धोखा है,
तुझसे ज्यादा इन्सां को हमने
इंसानों को नोचते देखा है,
ऐ श्वान ! तू लज्जा न कर,
देख जरा दुनिया को पलटकर;
वफादार है तू उनका,
जिस मालिक का खाता है,
पर,इंसानों-सा नमक हराम,
और कहीं ना देखा है।।
राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी (छुरिया)
राजनांदगाँव
9179798316
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