किसान की पीड़ा
किसान की पीड़ा
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आजादी से आज तक,
मिला मुझे आश्वासन,
भूल जाते हैं हमदर्दी भी,
पाकर के सिहांसन;
कौन सुनेगा?किसे सुनाऊँ?
युग-युग से रो रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ।।
कल तक थी जो मेरी हालत,
आज भी वहीं खड़ा हूँ,
कर्ज के साथ जिया हूँ जीवन,
कर्ज ही छोड़ मरा हूँ;
पीपल के पत्तों की भाँति
अब तक डोल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ।।
सदा उगाया अन्न खेतों पर,
खून-पसीना नित बहाकर;
सहता आया बेमौसम को,
दर्द सीने में दबाकर;
बदले में लोगों की जुबाँ पर
केवल अनमोल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ।।
क्या होली और क्या दीवाली?
सब दिन मेरे बराबर हैं,
कभी चूल्हे पर आग है जलता,
कभी जलता सीने पर है;
खुशहाली की उम्मीद लिए
हर तकलीफें झेल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ।।
माँग रहा हूँ सदियों से मैं
अपने श्रम की इतनी कीमत,
कि ख्वाबों को साकार सकूँ मैं,
जो है मेरे मन के भीतर,
चलती नहीं जीवन की गाड़ी,
फिर भी ढकेल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ,
मैं किसान बोल रहा हूँ।।
राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी (छुरिया)
जिला-राजनांदगाँव(छ.ग.)
9179798316
अमर उजाला काव्य में प्रकाशित।
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