बिरवा लगाव
घनाक्षरी
बिरवा लगाव
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जागो उठो नर-नारी,सुनो बात संगवारी,
जुरमिल सबो मन करव विचार गा।
कटागे हे रुख-राई,होवत हे करलाई,
धरती के करो संगी,चलव सिंगार गा।।
रुख बिना बाढ़ कहूँ,परत अकाल कहूँ,
आवत हे अलहन,घर-परिवार मा।
दिनों-दिन धरती के पानी गहरावत हे,
जीबो जिनगी ला हम कइसे संसार मा।।
रुख ले हे जिनगानी,शुद्ध हवा अउ पानी,
बिन पानी जिनगी हा कहाँ के ओसार गा।
फूल फर लाख लासा,जिनगी के आवे आसा,
काम आथे जड़ी-बूटी,परे मा बीमार गा।।
बिरवा लगाबो संगी,मिलके बचाबो संगी,
नहीं ते दन्दर जाबो,अकाल के मार मा।
अलहन झन करो,रुख के जतन करो,
तभे आही जिनगी मा,हमर बहार गा।।
राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी (छुरिया)
राजनांदगाँव
9179798316
प्रकाशित 01/10/18 दैनिक भास्कर "संगवारी" अंक बिलासपुर।
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