उठो-उठो, बढ़े चलो
पञ्चचामर छन्द
121 212 121 212 121 2=24 मात्राएँ
16 वर्ण प्रत्येक पंक्ति।
"उठो-उठो,बढ़े चलो"
उठो-उठो, बढ़े चलो,बिहान की हवा चली।
दवा हजार लाख से,हवा प्रभात की भली।
गँवाइये न वक्त को,पुनः मिले कभी नहीं।
विचार जो सँवार ले,जहान में भला वही।।
न जात-पाँत में बँटो,समान हो यहाँ सभी।
न क्रोध,लोभ,दम्भ,द्वेष चित्त में भरो कभी।
मनुष्य हो मनुष्य ही जहान में बनें रहो।
सदा सलाम राम-राम राहगीर को कहो।।
रहे सदा अखण्ड हिन्द देश की वसुंधरा।
बना रहे सदैव हिन्द की धरा हरा-भरा।
सदा रखो विचार एक,प्रेम,मित्रता घना।
करो अतुल्य काज नित्य हो सदा सराहना।।
राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी (छुरिया)
जिला-राजनांदगाँव
9179798316
Comments
Post a Comment