जग के उल्टा रीत

गीतिका )

         जग के उल्टा रीत
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झूठ के कतको गिराहिक,साँच हर बेमोल हे।
शांत हावे सत्यवादी,झूठ के बड़ बोल हे।
छटपटावत साँच हावे,हाल बड़ बेहाल हे।
वाह! कलजुग तोर लीला,झूठ मालामाल हे।।

आज मनखे हर भुलागे,साँच के सम्मान ला।
लोग गावत हे जगत मा,झूठ के गुणगान ला।
झूठ बनगे मीठ जग मा,साँच हा दुरिहात हे।
लोग खुद काँटा ल बो के,बाद मा पछतात हे।।

देख लव जी झूठ के सब,मान ला जी चार मा।
नोट आघू नाच नाचत,लोग हे संसार मा।
साँच होवत हे अकेला,झूठ के बड़ शान हे।
रीत उल्टा हे चलत अब,साँच के हिनमान हे।।

        राम कुमार चन्द्रवंशी
        बेलरगोंदी (छुरिया)
        जिला-राजनांदगाँव
         9179798316
दिनांक 21 जनवरी 2019 दैनिक दावा rjn में प्रकाशित।

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