निराशा छोड़ मानव

Subject: विधाता (प्रकाशित)

विधाता छन्द (मात्रिक) 28 मात्रा
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       " निराशा छोड़ मानव"
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निराशा छोड़ के मानव,करम संसार मा कर लव।
हराना हर विपत ला हे,भुजा मा बल अपन भर लव। भुलावव लक्ष्य मत खुद के,सदा हासिल करव बढ़ के। अपन दुर्भाग के रेखा,मिटालव भाग ला गढ़ के।।

अपन कर्तव्य ला जग मा,सदा कर लव रहत बेरा। लगावव झन कभू कोई,जगत मा वक्त के फेरा।
अगर गिरना पड़े जग मा,कभू तुम हार मत मानो।
हवे विश्वास जब मन मा, ठिकाना पास हे जानो।।

रुके पानी कभू जग मा,समुंदर ले कहाँ मिलथे?
बिना ठोकर सहे पथरा,घलो मूरत कहाँ बनथे?
सदा पाथे उही ठीहा,जगत मा कष्ट जे सहिथे।
पलट इतिहास के पन्ना,कहानी नित इही कहिथे।।

          राम कुमार चन्द्रवंशी
          बेलरगोंदी (छुरिया)
          जिला-राजनांदगाँव
          9179798316
प्रकाशित दैनिक दावा RJN 05/04/2019

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