बेरा लहुट नइ आवय
(मुक्तामणि छन्द)
"बेरा लहुट नइ आवय"
गिर के पाना पेड़ ले,फिर से जुड़ नइ पावै।
तस बेरा के हाल हे,लहुट कभू नइ आवै।
आये अवसर खोय ले,भविस कहाँ बन पाथे?
पुरखौती धन हर घलो,सदा हाथ ले जाथे।।
देथे समय ल मान जे,मान उही हर पाथे।
कठिन काम होथे सरल,आसमान छू आथे।
मइल हरे धन हाथ के,आवत-जावत रहिथे।
बेरा हर अनमोल हे, ज्ञानी मन सब कहिथे।।
बीते बात ल छोड़ के,बीज करम के बोवौ।
भूतकाल के याद मा,वर्तमान झन खोवौ।
जेन पसीना गारथे, तज के सदा अलाली।
पूछत ओकर द्वार मा,आथे नित खुसहाली।।
बेरा के हर काम हर,होथे नित फलदायी।
राखव गठरी बाँध के,भुलव बात झन भाई।
खुद के जिनगी के अगर,लिखना हवय कहानी।
कारज बेरा मा करव,छोड़व जी मनमानी।।
राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी (छुरिया)
जिला-राजनांदगाँव
9179798316
प्रकाशित दैनिक भास्कर "संगवारी"15/7/2019
Comments
Post a Comment