उठो-उठो ऐ प्यारे बच्चों
(कुकुंभ छन्द )
"उठो-उठो ऐ प्यारे बच्चों"
उठो-उठो ऐ प्यारे बच्चों,बीज कर्म का है बोना।
वक़्त तुम्हारे द्वार खड़ा है,अवसर कभी नहीं खोना। धारो मन में आज प्रतिज्ञा,पत्थर को पिघलाने की। मोती,सागर से पाने की,आसमान छू आने की।।
आये चाहे लाख मुसीबत,विचलित कभी नहीं होना। हँसते-हँसते आगे बढ़ना,धीरज कभी नहीं खोना।
साहस रक्खो मकड़ी सा नित,जो गिरता फिर चढ़ता है। व्यर्थ नहीं होता श्रम उनका,मिलती उन्हें सफलता है।।
तपता है जब खूब कोयला,हीरा तब बन पाता है। पत्थर भी तो ठोकर खाकर,जग में पूजा जाता है। मंजिल मिलती है उनको ही,जो नित आगे बढ़ता है। जीवन सरल नहीं है जग में,सरल बनाना पड़ता है।।
बनकर बोझ पराये काँधे, जीवन कभी नहीं जीना।
ऐसा काज तुम्हे है करना,जिससे तान चलो सीना।
कस लो अपनी आज कमर तुम,करना है रज को सोना। उठो,उठो ऐ प्यारे बच्चों,बीज कर्म का है बोना।।
राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी (छुरिया)
जिला-राजनांदगाँव
9179798316
प्रकाशित दैनिक दावा RJN 9/7/2019
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