बरसा हर अब आगे
(सार छन्द)
"बरसा हर अब आगे"
बरसा हर अब आगे संगी,बरसा हर अब आगे। आसमान मा करिया-करिया,बादर हर अब छागे। रिमझिम-रिमझिम जल बरसत हे,गरमी अब दुरिहागे। जस दुल्हिन लागत हे पिरथी,रुख-राई हरियागे।।
कलकल बहत हवय नदिया मा,सुग्घर जल के धारा। नीर बहत हे गाँव-सहर के,जम्मो आरा-पारा।
प्यासे सबो परानी मन के,अब जी प्यास बुझागे।
खेत-खार,बाड़ी हर सबके,सुग्घर अब बोवागे।।
छत्ता,खुमरी के दिन आगे,धरसा सब चिखलागे।
उजड़े बगिया के सँवरे के,देखव दिन हर आगे।
उड़-उड़,सुग्घर तितली-भँवरा,खुसी मनावत हावै।
बत्तर अउ फुरफुन्दी हर अब,पाँख हलावत हावै।।
कमल फूल तरिया भीतर मा,छतराये हे पाँखी।
निकल बीज ले सुग्घर पउधा,खोलत हावय आँखी। झिंगुरा,मेंढक जुरमिल के जी,गावत हावय गाना।
जम्मो के मन भागे संगी,बरसा के जी आना।।
राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी(छुरिया)
जिला-राजनांदगाँव
9179798316
प्रकाशित दैनिक दावा RJN 30/7/2019
Comments
Post a Comment