छत्तीसगढ़ी कविता
पेड़ लगावौ
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जेठ अंगरा, असाढ़ सुक्खा, जिनगी कइसे जीबो।
चेत करव सब मनखे मन हर , का खाबो, का पीबो।
पेड़ कटागे, छाँव गँवागे, चातर होगे भुइयाँ।
जल के स्वामी वरुण रिसागे, कोन मनाही गुइयाँ?
बिना पेड़ के मुरकेटत हे, मुँह ला बरखा रानी।
कभू भुखमरी कभू सुनामी, कलपत हवे किसानी।
जल हावे तब कल हर हावय, जल बिन जग हे सुन्ना।
बिना पेड़ के ऑक्सीजन मिल पाही कइसे मुन्ना?
पेड़ लगाये बिना चलावत, रहिहू रोज कुल्हाड़ी।
वो दिन जादा दूर कहाँ? जब नइ मिल पाही काड़ी।
बिना पेड़ के सपना होथे, जड़ी-दवा के आसा।
बिना लगाये कइसे पाबो? सुघर फूल फर लासा।।
जग मा नवा- नवा बीमारी, पनपत हावय भारी।
अब तो जागव जग के लोगन, छोड़व अत्याचारी।
अलहन जिनगी मा झन आवै,समझौ अउ समझावौ।
जिनगी अपन सँवारे खातिर, जुरमिल पेड़ लगावौ।।
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राम कुमार चन्द्रवंशी
बेलरगोंदी (छुरिया)
जिला- राजनांदगाँव (छ. ग.)
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